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Showing posts from September, 2020

गीता दृष्टि

  नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।   एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।10.40।।   यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।   तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।।10.41।। हे प रंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है; अपनी विभूतियों का यह विस्तार मैंने एक देश से अर्थात् संक्षेप में कहा है।।    जो कोई भी विभूतियुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है, उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।। 10.19 मे भगवान ने कहा कि मेरे विस्तार का अंत नहीं है ,इसलिए मैं अपनी विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा । भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने में भाषा की असमर्थता प्रकट की था। किन्तु- फिर भी शिष्य के लिए केवल स्नेहवश भगवान् श्रीकृष्ण ने इस असम्भव कार्य को यथासम्भव सम्पन्न करने के लिए अपने हाथों में लिया। कृष्ण कहते हैं, मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। जहां भी तुझे लगे ऐश्वर्य, जहां भी तुझे लगे कांति, जहां भी तुझे लगे विभूति, जहां भी तुझे लगे कि कुछ असाधारण घटित हुआ है, जहां भी तुझे लगे कि कोई चीज अपनी चरमत...

गीता दृष्टि

  यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।   न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।10.39। ।   हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है।। सम्पूर्ण सृष्टि का बीज अर्थात मूल आत्मा /परमात्मा  ही हैं । चर हो या अचर ( moving or non-moving) सभी भूत मुझसे ही है , अर्थात मैं उनमे विध्यमान हूँ । वस्तुत: अनुभूति में सृष्टि और स्रष्टा पृथक—पृथक नहीं हैं, वे एक ही हैं। वह इसमें समाया है, इसीलिए इसका अस्तित्व है। वह मौजूद है, इसीलिए यह मौजूद है। इसका अर्थ यह हुआ कि हम ईश्वर को अस्तित्व का पर्यायवाची मानें। अस्तित्व ही ईश्वर है। यह एक अत्यन्त सुन्दर एवं तत्त्वबोधक उदाहरण हमारे प्राचीन ऋषियों ने दिया है। गर्भावस्था से, कालान्तर में अनुकूल परिस्थितियों में, यह अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है और उसकी इस प्रथम अभिव्यक्ति को ऋषियों ने सुन्दर नाम दिया है-- हिरण्यगर्भ। कृष्ण ने कहा है, ऐसा चर और अचर कोई भी नहीं है, जो मेरे से रहित होवे। ऐसी कोई भी सत्ता नहीं है, जहां मैं मौजूद नहीं हूं। ले...

गीता दृष्टि

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।   मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।10.38। मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ और जीत की चाहना रखने वालों की नीति हूँ; मैं गुह्यों ( गोपनियों )में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।।     Of those who punish, I am the sceptre; among those who seek victory, I am statesmanship; and also among secrets, I am silence; And of those who are wise, I am wisdom. उपरोक्त संकेत मे दिये गए दो उदाहरण राजा और प्रजा के संदर्भ  मे हैं ।   शासक राजा और शासित प्रजा दोनों को ही अपने राज्य के लिए समान रूपसे काम करना होता है।  सामान्य प्रजा शासन के प्रति आदर और निष्ठा होने के कारण शासकों के नियमों और दण्ड के अधीन रहती है। जीत की कामना रखने  वालों  की नीति से भी आशय राजनीति से है। वास्तविक व पूर्ण विजय वही है जिसमें विजेता पक्ष बुद्धिमत्तापूर्वक लागू की गई शासन की नीतियों के द्वारा पराजित पक्ष को अपनी संस्कृति एवं विचारधारा में परिवर्तित कर देता है।  अगले दो प्रतीक बहुत खास है -  मैं गुह्यों ( गोपनियों )में...

गीता दृष्टि

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।   मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।।10.37। । वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मैं मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।।   मधु राजा के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र एक यादवराज था। इसी के कुल में श्रीकृष्ण पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए। इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था। ये लोग द्वारका में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया। 'वृष्णि गणराज्य' शूरसेन प्रदेश में स्थित था। इन वृष्णियों के वंश में वसुदेव का जन्म हुआ था। उनका विवाह मथुरा के क्रूर कंस की बहन देवकी के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पुत्र थे श्रीकृष्ण। वसुदेव के पुत्र होने के कारण वे वासुदेव के नाम से विख्यात हुए। यहाँ  भगवान अपने वंशकीबात कह रहे हैं लेकिन भगवान ने अध्याय 7.19 मे भी वासुदेव का उल्लेख किया है - यह वासूदेव देवत्व के व्यक्तित्व के संदर्भ मे है ।   बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।   वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।   मैं पाण्ड...