नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।10.40।।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।।10.41।।
हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है; अपनी विभूतियों का यह विस्तार मैंने एक देश से अर्थात् संक्षेप में कहा है।।
जो कोई भी विभूतियुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है, उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।।
10.19 मे भगवान ने कहा कि मेरे विस्तार का अंत नहीं है ,इसलिए मैं अपनी विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा । भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने में
भाषा की असमर्थता प्रकट की था। किन्तु- फिर भी शिष्य के लिए केवल स्नेहवश
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस असम्भव कार्य को यथासम्भव सम्पन्न करने के लिए
अपने हाथों में लिया।कृष्ण कहते हैं, मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। जहां
भी तुझे लगे ऐश्वर्य, जहां भी तुझे लगे कांति, जहां भी तुझे लगे विभूति,
जहां भी तुझे लगे कि कुछ असाधारण घटित हुआ है, जहां भी तुझे लगे कि कोई चीज
अपनी चरमता को पहुंच गई, अपनी ऊंचाई को छू ली..तो समझना वह मैं ही हूँ ॥
अमेरिका
के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक इरिक फ्रोम ने एक शब्द ईजाद किया है, और प्रचलित
हो गया है और कीमती शब्द है। इरिक फोम ने कहा है कि जहां भी पीक
एक्सपीरिएंस, कोई शिखर अनुभव हो, वहीं व्यक्तित्व उस रहस्यमय के करीब
पहुंचता है।
पीक
एक्सपीरिएंस! कोई भी अनुभव जहां शिखर पर हो, जहां से आपको लगे कि इसके पार
जाना कहां संभव है, जहां आपको लगे कि इसके पार नहीं जाया जा सकता, वहीं आप
समझना...।इस अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को तथा उसके निमित्त से
समस्त भावी पीढ़ियों के जिज्ञासुओं के लिए इन 54 विभूतियों के द्वारा, असंख्य उपाधियों के आवरण या परिधान में गुप्त वास कर रहे, अनन्त परमात्मा
की क्रीड़ा को दर्शाया है। जो साधक इन विभूतियों का ध्यान करके अपने मन को
पूर्णत प्रशिक्षित कर लेगा वह इस बहुविध सृष्टि के पीछे स्थित एक अनन्त
परमात्मा को सरलता से सर्वत्र पहचानेगा।हमें यह बताया गया है कि हम विवेक के द्वारा इसी अनित्य
जगत् में नित्य और दिव्य तत्त्व को पहचान सकते हैं। उपर्युक्त दृष्टान्तों
से यह स्पष्ट होता है कि जगत् की चराचर वस्तुओं में स्वयं भगवान् अपने को
ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त रूप में अभिव्यक्त करते हैं। वे
समस्त नाम और रूपों में विद्यमान हैं। ऐश्वर्ययुक्त,
कांतियुक्त, शक्तियुक्त जो भी है, वहीं मेरी विभूति है, वहीं मैं प्रकट
हुआ हूं? वहीं तू मुझे देख लेना। और जहां भी यह घटित हो, समझना कि मेरे तेज
के अंश से ही उत्पन्न हुआ है, मेरी ही ज्योति वहां प्रज्वलित हो रही है;
मेरे ही अमृत की धार वहां बहती है; मेरे ही स्वरों का संगीत है वहां; मेरी
ही सुवास है; मेरे ही हृदय की धड़कन वहां भी धड़कती है।
इस में कोई सन्देह नहीं कि उपर्युक्त विस्तृत विवेचन का यह सारांश अपूर्व है।
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