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गीता दृष्टि

  अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।11.1।। मदनुग्रहाय परमं गुह्यम् अध्यात्मसञ्ज्ञितम् यत् त्वया उक्तं वचः तेन मोहः अयं विगतः मम ॥ १ ॥ अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय, अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।। परम  गोपनीय आध्यात्मिक वचन या विषय क्या है ? अध्याय 8 .3 मे कहा है परम अक्षर ब्रह्म जो की आत्मा का स्वभाव है वही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है और जो भूतो के भावों को उत्पन्न करने का विसर्ग ही कर्म है । भूत ,वर्तमान और भविष्य की जो पृकृति की क्रिया है वही संसार है ,और वही कर्म है । पृकृति परमात्मा से ही है इसलिए मूल तत्व तो आत्मा ही है जो परमात्मा का स्वभाव है , वही आध्यत्म है और यह परम गोपनीय है । भगवान ने अध्याय 9.1 मे कहा है      इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।  यही    परम गोपनीय गोपनियों का राजा भी है । गोपनीय इसलिए है क्यूंकी वह बताया नहीं जा सकता वह अनुभव करने योग्य है और मज़ेदार बात यह कि जो अनुभव कर लेता है फिर...

गीता दृष्टि

      अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।   विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।।10.42।।   अथवा  , हे अर्जुन ! बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ। ईश्वर के अनंत होने का अर्थ है, यह जगत उसकी एक अभिव्यक्ति है। उसकी अनेक अभिव्यक्तियां हो सकती हैं। होती रही हैं। होती रहेंगी। इसलिए कहा, एक अंश में ही मेरी योग—माया का उपयोग है। अनन्त तत्त्व के अनन्त विस्तार का वर्णन कैसे संभव हो सकता है असमर्थता के कारण उन्हें विषाद है किन्तु पुन अपने शिष्य के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण? भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण अध्याय का सार इस अन्तिम श्लोक में बताते हैं।इस बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है वास्तव मे देखा जाय- तो अनन्त तत्त्व को प्रत्येक परिच्छिन्न रूप में दर्शाने का प्रयत्न व्यर्थ ही है? क्योंकि वह असंभव है। योग—माया शब्द का ठीक वही अर्थ होता है, जो अंग्रेजी में मैजिक का होता है, जादू का होता है। लेकिन जादू तो जादूगर करता है! पर आपने खयाल किया, जादूगर करता क्या है? वह कहता है कि यह र...

गीता दृष्टि

  नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।   एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।10.40।।   यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।   तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।।10.41।। हे प रंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है; अपनी विभूतियों का यह विस्तार मैंने एक देश से अर्थात् संक्षेप में कहा है।।    जो कोई भी विभूतियुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है, उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।। 10.19 मे भगवान ने कहा कि मेरे विस्तार का अंत नहीं है ,इसलिए मैं अपनी विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा । भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने में भाषा की असमर्थता प्रकट की था। किन्तु- फिर भी शिष्य के लिए केवल स्नेहवश भगवान् श्रीकृष्ण ने इस असम्भव कार्य को यथासम्भव सम्पन्न करने के लिए अपने हाथों में लिया। कृष्ण कहते हैं, मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। जहां भी तुझे लगे ऐश्वर्य, जहां भी तुझे लगे कांति, जहां भी तुझे लगे विभूति, जहां भी तुझे लगे कि कुछ असाधारण घटित हुआ है, जहां भी तुझे लगे कि कोई चीज अपनी चरमत...

गीता दृष्टि

  यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।   न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।10.39। ।   हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है।। सम्पूर्ण सृष्टि का बीज अर्थात मूल आत्मा /परमात्मा  ही हैं । चर हो या अचर ( moving or non-moving) सभी भूत मुझसे ही है , अर्थात मैं उनमे विध्यमान हूँ । वस्तुत: अनुभूति में सृष्टि और स्रष्टा पृथक—पृथक नहीं हैं, वे एक ही हैं। वह इसमें समाया है, इसीलिए इसका अस्तित्व है। वह मौजूद है, इसीलिए यह मौजूद है। इसका अर्थ यह हुआ कि हम ईश्वर को अस्तित्व का पर्यायवाची मानें। अस्तित्व ही ईश्वर है। यह एक अत्यन्त सुन्दर एवं तत्त्वबोधक उदाहरण हमारे प्राचीन ऋषियों ने दिया है। गर्भावस्था से, कालान्तर में अनुकूल परिस्थितियों में, यह अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है और उसकी इस प्रथम अभिव्यक्ति को ऋषियों ने सुन्दर नाम दिया है-- हिरण्यगर्भ। कृष्ण ने कहा है, ऐसा चर और अचर कोई भी नहीं है, जो मेरे से रहित होवे। ऐसी कोई भी सत्ता नहीं है, जहां मैं मौजूद नहीं हूं। ले...

गीता दृष्टि

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।   मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।10.38। मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ और जीत की चाहना रखने वालों की नीति हूँ; मैं गुह्यों ( गोपनियों )में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।।     Of those who punish, I am the sceptre; among those who seek victory, I am statesmanship; and also among secrets, I am silence; And of those who are wise, I am wisdom. उपरोक्त संकेत मे दिये गए दो उदाहरण राजा और प्रजा के संदर्भ  मे हैं ।   शासक राजा और शासित प्रजा दोनों को ही अपने राज्य के लिए समान रूपसे काम करना होता है।  सामान्य प्रजा शासन के प्रति आदर और निष्ठा होने के कारण शासकों के नियमों और दण्ड के अधीन रहती है। जीत की कामना रखने  वालों  की नीति से भी आशय राजनीति से है। वास्तविक व पूर्ण विजय वही है जिसमें विजेता पक्ष बुद्धिमत्तापूर्वक लागू की गई शासन की नीतियों के द्वारा पराजित पक्ष को अपनी संस्कृति एवं विचारधारा में परिवर्तित कर देता है।  अगले दो प्रतीक बहुत खास है -  मैं गुह्यों ( गोपनियों )में...

गीता दृष्टि

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।   मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।।10.37। । वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मैं मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।।   मधु राजा के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र एक यादवराज था। इसी के कुल में श्रीकृष्ण पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए। इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था। ये लोग द्वारका में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया। 'वृष्णि गणराज्य' शूरसेन प्रदेश में स्थित था। इन वृष्णियों के वंश में वसुदेव का जन्म हुआ था। उनका विवाह मथुरा के क्रूर कंस की बहन देवकी के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पुत्र थे श्रीकृष्ण। वसुदेव के पुत्र होने के कारण वे वासुदेव के नाम से विख्यात हुए। यहाँ  भगवान अपने वंशकीबात कह रहे हैं लेकिन भगवान ने अध्याय 7.19 मे भी वासुदेव का उल्लेख किया है - यह वासूदेव देवत्व के व्यक्तित्व के संदर्भ मे है ।   बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।   वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।   मैं पाण्ड...