गीता दृष्टि
अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।।11.1।। मदनुग्रहाय परमं गुह्यम् अध्यात्मसञ्ज्ञितम् यत् त्वया उक्तं वचः तेन मोहः अयं विगतः मम ॥ १ ॥ अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय, अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।। परम गोपनीय आध्यात्मिक वचन या विषय क्या है ? अध्याय 8 .3 मे कहा है परम अक्षर ब्रह्म जो की आत्मा का स्वभाव है वही अध्यात्म के नाम से जाना जाता है और जो भूतो के भावों को उत्पन्न करने का विसर्ग ही कर्म है । भूत ,वर्तमान और भविष्य की जो पृकृति की क्रिया है वही संसार है ,और वही कर्म है । पृकृति परमात्मा से ही है इसलिए मूल तत्व तो आत्मा ही है जो परमात्मा का स्वभाव है , वही आध्यत्म है और यह परम गोपनीय है । भगवान ने अध्याय 9.1 मे कहा है इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। यही परम गोपनीय गोपनियों का राजा भी है । गोपनीय इसलिए है क्यूंकी वह बताया नहीं जा सकता वह अनुभव करने योग्य है और मज़ेदार बात यह कि जो अनुभव कर लेता है फिर...