गीता दृष्टि
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।।10.37।।
वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मैं मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।।
मधु राजा के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र एक यादवराज था। इसी के कुल में श्रीकृष्ण पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए। इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था। ये लोग द्वारका में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया। 'वृष्णि गणराज्य' शूरसेन प्रदेश में स्थित था। इन वृष्णियों के वंश में वसुदेव का जन्म हुआ था। उनका विवाह मथुरा के क्रूर कंस की बहन देवकी के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पुत्र थे श्रीकृष्ण। वसुदेव के पुत्र होने के कारण वे वासुदेव के नाम से विख्यात हुए। यहाँ भगवान अपने वंशकीबात कह रहे हैं लेकिन भगवान ने अध्याय 7.19 मे भी वासुदेव का उल्लेख किया है -यह वासूदेव देवत्व के व्यक्तित्व के संदर्भ मे है ।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।
मैं पाण्डवों में धनंजय हूँ जिस प्रकार श्रीकृष्ण के पराक्रम से यादव कुल और वृष्णि वंश कृतार्थ और विख्यात होकर मनुष्य की स्मृति में बने रहे, उसी प्रकार पाण्डवों में धनंजय अर्जुन का स्थान था, जिसके बिना पाण्डवों को कुछ भी उपलब्धि नहीं हो सकती थी। अर्जुन तीसरे पुत्र थे जो देवताओं के राजा इन्द्र से हुए। धनंजय का वाच्यार्थ है धन को जीतने वाला। अर्जुन को अपने पराक्रम के कारण राज्यों को जीतकर जो संपत्ति अर्जित की ,इसलिए उन्हें यह नाम उपाधि स्वरूप प्राप्त,हुआ था।
मैं मुनियों में व्यास हूँ - व्यास एक उपाधि अथवा धारण किया हुआ नाम है। उस युग में दार्शनिक एवं धार्मिक लेखन के क्षेत्र में जो एक नयी शैली का अविष्कार तथा प्रारम्भ किया गया उसे व्यास नाम से ही जाना जाने लगा अर्थात् व्यास शब्द उस शैली का संकेतक बन गया। यह नवीन शैली क्रान्तिकारी सिद्ध हुई- क्योंकि उस काल तक दार्शनिक साहित्य सूत्र रूप मन्त्रों में लिखा हुआ था। पुराणों की रचना के साथ एक नवीन पद्धति का आरम्भ और विकास हुआ- जिसमें सिद्धांतों को विस्तृत रूप से समझाने का उद्देश्य था। इसके साथ ही उसमें मूलभूत सिद्धांतों को बारम्बार दाेहरा कर उस पर विशेष बल दिया जाता था। इस पद्धति का प्रारम्भ और विकास कृष्ण द्वैपायन जी ने व्यास नाम धारण करके किया। व्यास शब्द का वाच्यार्थ है--विस्तार।इस प्रकार समस्त मुनियों में अपने को व्यास कहने में भगवान् का अभिप्राय यह है कि सभी मननशील पुरुषों में भगवान् वे हैं जो पुराणों की अपूर्व और अतिविशाल रचना के रचयिता हैं।
मैं कवियों में उशना कवि हूँ - गीता मे लगभग सभी अर्थों मे उशना कवि का तात्पर्य शुक्र या शुक्राचार्य दिया है । परंतु वेदो मे उशना ऋषि या उशना काव्य का उल्लेख है ऋग्वेद में ८.८४, ९.८७ - ९.८९ सूक्तों के ऋषि उशना काव्य हैं ।इसके अतिरिक्त सामवेद में ९ सामों के ऋषि उशना काव्य हैं यह आश्चर्यजनक है कि पुराण उशना , कवि और शुक्र को एक ही बताते हैं , जबकि वैदिक साहित्य में ऐसा कोई उल्लेख ही नहीं है ।पुराणकार को उशना नाम उतना प्रिय नहीं है जितना शुक्र । लेकिन पुराण कथा बताती है कि शुक्र का शुक्र नाम तब पडा जब वह शिव के शुक्र मार्ग से बाहर आए ।
कवि का अर्थ है क्रान्तिदर्शी अर्थात् सर्वज्ञ।उपनिषदों में कवि शब्द का अर्थ मन्त्रद्रष्टा भी है।
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