गीता दृष्टि

 यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

 न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।।10.39।

  हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है।।

सम्पूर्ण सृष्टि का बीज अर्थात मूल आत्मा /परमात्मा  ही हैं । चर हो या अचर ( moving or non-moving) सभी भूत मुझसे ही है , अर्थात मैं उनमे विध्यमान हूँ ।
वस्तुत: अनुभूति में सृष्टि और स्रष्टा पृथक—पृथक नहीं हैं, वे एक ही हैं।वह इसमें समाया है, इसीलिए इसका अस्तित्व है। वह मौजूद है, इसीलिए यह मौजूद है। इसका अर्थ यह हुआ कि हम ईश्वर को अस्तित्व का पर्यायवाची मानें। अस्तित्व ही ईश्वर है। यह एक अत्यन्त सुन्दर एवं तत्त्वबोधक उदाहरण हमारे प्राचीन ऋषियों ने दिया है। गर्भावस्था से, कालान्तर में अनुकूल परिस्थितियों में, यह अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है और उसकी इस प्रथम अभिव्यक्ति को ऋषियों ने सुन्दर नाम दिया है-- हिरण्यगर्भ।

कृष्ण ने कहा है, ऐसा चर और अचर कोई भी नहीं है, जो मेरे से रहित होवे। ऐसी कोई भी सत्ता नहीं है, जहां मैं मौजूद नहीं हूं। लेकिन पत्थर की तो हम बात छोड़ दें, आदमी को भी पता नहीं चलता कि वह मौजूद है। पत्थर में भी वह मौजूद है। पत्थर को हम छोड़ दें, आदमी को भी पता नहीं चलता कि वह मेरे भीतर मौजूद है। हमें भी अनुभव नहीं होता कि वह हमारे भीतर मौजूद है। और हम भी उसे खोजने निकलते हैं, तो कहीं और खोजने निकलते हैं—काबा में, काशी में, मक्का में, मदीना में—  यह खयाल ही नहीं आता कि वह यहां भीतर हो सकता है। क्या कारण होगा?
कारण बहुत सहज, बहुत सरल है। जो अति निकट होता है, वह विस्मरण हो जाता है। जो बहुत निकट होता है, उसकी हमें याद ही नहीं आती। और जो भीतर ही होता है, उसका हमें पता ही नहीं चलता। हमें पता ही उन चीजों का चलता है, जो दूर होती हैं, जिनमें और हममें फासला होता है। बोध के लिए बीच—बीच में गैप, अंतराल चाहिए। हमारे और परमात्मा के बीच में कोई अंतराल नहीं है, इसलिए बोध पैदा नहीं हो पाता। परमात्मा और हमारे बीच कभी ऐसी घटना नहीं घटती कि परमात्मा मौजूद न हो। अगर एक क्षण को भी परमात्मा गैर—मौजूद हो जाए, तो हमें पता चले।
 यदि हमसे यह कहा जाता है कि कोई दस आभूषण स्वर्ण से बने हैं तथा स्वर्ण के बिना उनका अस्तित्व नहीं हो सकता है, तो स्पष्ट है कि वर्तमान में भी वे आभूषण स्वर्ण रूप ही हैं। इसी प्रकार,  भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे इस संसार बीज के वृक्ष हैं इस आंशिक कथन में वे इस बात को भी जोड़ते हैं कि मेरे बिना कोई भूतवस्तु नहीं रह सकती। इसलिए यह विश्व भगवत्स्वरूप ही है।अब तक किये गये सम्पूर्ण विवेचन का उपसंहार- भगवान् अगले तीन श्लोकों में करते हैं

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