गीता दृष्टि
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।10.33।। पहले भगवान ने विध्याओं मे अपने को आध्यात्म विध्या कहा - अब कह रहे है - अक्षरों मे अकार हूँ । भगवान अर्जुन को कई प्रतीको से समझाने का प्रयास प्रारम्भ से ही करते रहें हैं । अध्याय 8.3 मे जो कहा है वह आध्यात्म के विध्या के बारे मे था - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।। परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है उसको अध्यात्म कहते हैं।( Brahman is the Imperishable, the Supreme; Its essential nature is called Self-knowledge) प्राणियोंका उद्भव करनेवाला जो त्याग है उसकी कर्म संज्ञा है। जिसका क्षर (नाश) नहीं होता वह ब्रम्ह है ,ब्रम्ह ही नहीं परम ब्रम्ह है और जीव का स्वभाव आध्यात्म है अर्थात जो आत्मा का होना जानने मे आ रहा है जो पृकृति के माध्यम से आता है वह आध्यात्म है- यही गुह्य ज्ञान है , यह ही राजविदया है , । प्रत्येक अक्षर का सारतत्त्व प्रत्येक व्यंजन में अ जोड़कर ही उसका उच्चारण किया जाता है। भाषा में स्वरों की सहायता क...