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Showing posts from July, 2020

गीता दृष्टि

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः।।10.33।। पहले भगवान ने विध्याओं मे अपने को आध्यात्म विध्या कहा - अब कह रहे है -   अक्षरों मे अकार हूँ । भगवान अर्जुन को कई प्रतीको से समझाने का प्रयास प्रारम्भ से ही करते रहें हैं । अध्याय  8.3 मे जो कहा है वह आध्यात्म  के विध्या के बारे मे था - अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।। परम अक्षर ब्रह्म है और जीवका अपना जो होनापन है उसको अध्यात्म कहते हैं।( Brahman is the Imperishable, the Supreme; Its essential nature is called Self-knowledge) प्राणियोंका उद्भव करनेवाला जो त्याग है उसकी कर्म संज्ञा है। जिसका क्षर (नाश) नहीं होता वह ब्रम्ह है ,ब्रम्ह ही नहीं परम ब्रम्ह है और जीव का स्वभाव आध्यात्म है अर्थात जो आत्मा का होना जानने मे आ रहा है जो पृकृति के माध्यम से आता है वह आध्यात्म है- यही गुह्य ज्ञान है , यह ही राजविदया है , । प्रत्येक अक्षर का सारतत्त्व प्रत्येक व्यंजन में अ जोड़कर ही उसका उच्चारण किया जाता है। भाषा में स्वरों की सहायता क...

गीता दृष्टि

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।।10.32।। हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ, मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या और विवाद करने वालों में (अर्थात् तत्व निर्णय के लिए ) मैं वाद हूँ।। अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारम्भ करने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का सामान्य कथन ही यहाँ प्रतिध्वनित होता है। वहाँ उन्होंने यह बताया है कि वे किस प्रकार प्रत्येक वस्तु और प्राणी की आत्मा हैं। भगवान आदि और अंत के बाद मध्य भी कह देते है । अध्याय 2 .28 मे भगवान ने कहा है - हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है?  यह बात अर्जुन को एक सामान्य मनुष्य के दृष्टिकोण से काही गई थी इसलिए ही यहाँ भी उन्हें मध्य कहना था । आज का व्यक्त इसके पूर्व कल अव्यक्त था वर्तमान में वह व्यक्त रूप में उपलब्ध है परन्तु भविष्य में फिर अव्यक्त अवस्था में विलीन हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान स्थिति अज्ञात से आयी और पुन अज्ञात में लीन हो जायेगी। ...

गीता दृष्टि

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।।10.31।।   मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ; तथा मत्स्यों (जलचरों) में मैं मगरमच्छ और नदियों में मैं गंगा हूँ। किसी स्थान की स्वच्छता के लिए सूर्य और वायु के समान प्रभावशाली अन्य कोई स्वास्थयकर साधऩ उपलब्ध नहीं है। यदि यहाँ केवल वायु का ही उल्लेख किया गया है,  तो उसका कारण यह है कि  सूर्य की उष्णता में ही वायु की गति हो सकती है। जहाँ सदा वायु बहती है,  वहाँ सूर्य का होना भी सिद्ध होता है। किसी गुफा में न सूर्य का प्रकाश होता है और न वायु का स्पन्दन। वायु इस जगत में सर्वाधिक स्वतंत्र है। और स्वतंत्रता ही पवित्रता है। वायु कहीं बंधी नहीं है, कहीं ठहरी नहीं है, कहीं उसका लगाव नहीं है, कहीं उसकी आसक्ति नहीं है। वायु एक सतत गति है।जहां ठहराव है वहाँ अपवित्रता होगी ही -- जैसे नदी बहती है, तो नदी पवित्र होती है। और डबरा बहता नहीं, अपवित्र हो जाता है।ठहराव का अर्थ यूं समझें जैसे आसक्ति । प्राचीन समय से संन्यासी को प्रवाहवत जीवन व्यतीत करने को कहा गया है। नदी ...

गीता दृष्टि

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।10.30।।   मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ।। गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ । काल समय का बोध करता है । काल  मृत्यु का नाम है । काल से भगवान यहाँ गणना करने वालो का बोध कराते हैं । समय भी बड़ा कैलकुलेटर है। समय से ज्यादा ठीक गिनती करने वाला कोई भी नहीं दिखाई पड़ता। एक—एक व्यक्ति को एक—एक क्षण से ज्यादा कभी नहीं मिलता, काल ध्रुव का भी नाम है जो राजा उत्तानपाद के सुनीति से उत्पन्न हुये । यह कहानी सभी को ज्ञात है - ध्रुव ने नारद जी के कहने पर नारायण की भक्ति की और उसकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन देकर कहा- " हे राजकुमार! मैं तेरे अन्तःकरण की बात को जानता हूँ । तेरी सभी इच्छायें पूर्ण होंगी । तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वह लोक प्रदान करता हूँ जिसके चारों ओर ज्योतिश्चक्र घूमता रहता है तथा जिसके आधार पर यह सारे ग्रह नक्षत्र घूमते हैं । प्रलयकाल में भी जिसका नाश नहीं होता । सप्तर्...

गीता दृष्टि

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।10.30।। मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ। देवताओं की नाग की यम की चर्चा के बाद भगवान दैत्यों पर आते है ,यहा यह भी उल्लेखनीय है कि गीता मे केवल यहाँ ही इस शब्द का प्रयोग किया गया है । दैत्य वायुपुराण के अनुसार दिति के गर्भ से उत्पन्न कश्यप ऋषि के पुत्र थे।उन्हें 'असुर' और 'राक्षस' भी कहा गया है। देवता दैत्यों के सौतेले भाई थे और कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र थे।हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष प्रसिद्ध दैत्य थे । प्रह्लाद हिरण्यकश्यप नामक दैत्य राजा का पुत्र था, जिसे भगवान् हरि में अटूट श्रद्धा और दृढ़ भक्ति थी।दैत्य के घर में जन्मता है और परम भक्ति को उपलब्ध हो जाता है।ओशो इसकी व्याख्या कुछ इस तरह से करते हैं - आदमी का डायनेमिक्स, आदमी के जीवन की गति जो है, वह पोलेरिटीज में होती है, ध्रुवीयता में होती है, वैपरीत्य में होती है। हम सब विपरीत की तरफ झुकते चले जाते हैं।यह प्रहाद...