गीता दृष्टि

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।

 मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।10.38।

मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ और जीत की चाहना रखने वालों की नीति हूँ; मैं गुह्यों ( गोपनियों )में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।। 

 Of those who punish, I am the sceptre; among those who seek victory, I am statesmanship; and also among secrets, I am silence; And of those who are wise, I am wisdom.

उपरोक्त संकेत मे दिये गए दो उदाहरण राजा और प्रजा के संदर्भ  मे हैं ।   शासक राजा और शासित प्रजा दोनों को ही अपने राज्य के लिए समान रूपसे काम करना होता है।  सामान्य प्रजा शासन के प्रति आदर और निष्ठा होने के कारण शासकों के नियमों और दण्ड के अधीन रहती है। जीत की कामना रखने  वालों  की नीति से भी आशय राजनीति से है। वास्तविक व पूर्ण विजय वही है जिसमें विजेता पक्ष बुद्धिमत्तापूर्वक लागू की गई शासन की नीतियों के द्वारा पराजित पक्ष को अपनी संस्कृति एवं विचारधारा में परिवर्तित कर देता है। 

अगले दो प्रतीक बहुत खास है -  मैं गुह्यों ( गोपनियों )में मौन हूँ - किसी रहस्य का सारतत्व ही मौन है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अध्यात्मशास्त्र में आत्मज्ञान का वर्णन भी गुह्यतम अथवा राजगुह्य के रूप में किया गया है ,  क्योंकि सामान्यत यह ज्ञात नहीं है। ओशो ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की -है-यह बड़ा उलटा मालूम पड़ेगा, क्योंकि गोपनीय तो हम किसी बात को रखते हैं। मौन को भी कोई गोपनीय रखता है? गोपनीय तो हम किसी विचार को रखते हैं। निर्विचार को भी कोई गोपनीय रखता है? कोई बात छिपानी हो तो हम छिपाते हैं। मौन का तो अर्थ हुआ कि छिपाने को ही कुछ नहीं है। जब छिपाने को ही कुछ नहीं है, तो उसे हम क्या छिपाएगे! यह सूत्र बहुत कठिन है और उन गहरे सूत्रों में से एक है, जिन पर धर्म की बुनियाद निर्मित होती है।बायजीद ने पूछा, अपने मौन को आप छिपाना क्यों चाहते हैं? उसके गुरु ने कहा, इस जगत में अगर कुछ भी छिपाने योग्य है, तो मौन है। क्योंकि वह अंतरतम संपदा है। और वह इतनी नाजुक संपदा है कि जरा बाहर प्रभावित करने की इच्छा से टूट जाती है और खो जाती है।मौन में सबसे बड़ी कठिनाई है दूसरे की मौजूदगी, जो आपके मन में सदा बनी रहती है। जब आप मौन बैठते हैं, तब भी आप मौन कहां बैठते हैं, किन्हीं दूसरों से कल्पना में बात करते रहते हैं ।

मौन का अर्थ है, भीतर कोई विचार न रह जाए, भीतर कोई विचार का कंपन न हो, जैसे झील शांत हो गई हो, कोई लहर न उठती हो।
लेकिन कृष्ण कहते हैं, गोपनीयों में मैं मौन हूं।

और यह सबसे गुप्त बात है, जिसे किसी को बताना ही मत। बताते ही यह नष्ट हो जाती है। 

  और ज्ञानवानों का तत्व—ज्ञान मैं ही हूं।

यह आखिरी प्रतीक इस आयाम में।
ज्ञानवानों का तत्व—ज्ञान मैं ही हूं।   
ज्ञान से अर्थ है, सत्य का निजी अनुभव, अपना अनुभव।
कृष्‍ण कहते हैं, ज्ञानियों, ज्ञानवानों का तत्व—ज्ञान मैं ही हूं अनुभव मैं ही हूं।
और यह बड़े मजे की बात है कि उस तत्व—ज्ञान में, उस निजी अनुभव में जो जाना जाता है, वही परमात्मा है। निजी अनुभव में जो जाना जाता है, वही परमात्मा है। निजी अनुभव ही परमात्मा है। परमात्मा के संबंध में जानना परमात्मा को जानना नहीं है। टु नो अबाउट गॉड इज नाट टु नो गॉड। अबाउट, संबंध में—झूठी बातें हैं। परमात्मा को ही जानना, संबंध में नहीं। उसके बाबत नहीं, उसको ही जानना तत्व—ज्ञान है। यह कब घटित होता है? अज्ञान हमारी सहज स्थिति है। फिर अज्ञान को हम ज्ञान से ढांक लेते हैं, तो भ्रांति पैदा होती है। लगता है, जान लिया।
ऐसा नहीं होता कि आपके सामने परमात्मा खड़ा है, और आप अनुभव कर रहे हैं। इसमें तो दूरी रह जाएगी। एक अनुभव है, जहां व्यक्ति समष्टि में लीन हो जाता है। उस अनुभव का नाम ही परमात्मा है। शायद कठिन मालूम पड़े। परमात्मा का कोई अनुभव नहीं होता, देअर इज नो एक्सपीरिएंस ऑफ गॉड, बट ए सटेंन एक्सपीरिएंस इज नोन एज गॉड। एक खास अनुभव!
वह अनुभव क्या है? वह अनुभव है, जहां बूंद सागर में खोती है। जहां बूंद सागर में खोती है, तो बूंद को जो अनुभव होता होगा! जैसे व्यक्ति जब समष्टि में खोता है, तो व्यक्ति को जो अनुभव होता है, उस अनुभव का नाम परमात्मा है।

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