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Showing posts from August, 2020

गीता दृष्टि

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।   जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।10.36।।   मैं तेजस्वियों का तेज हूँ ।  तेजस्वी वस्तुओं का जो तेज है,  उसमें उस वस्तु के गुण नहीं होते हैं। उस तेज में अपने स्वयं के गुण भी नहीं होते। तेज केवल एक अनुभव है। जैसा कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था-  निसन्देह सत्य एक प्रकाश है,  परन्तु वह गुणरहित प्रकाश है। जीतने वालों की जय  निश्चय करने वालों का निश्चय एवं सात्विक लोगो का सत्व मैं हूँ । यह सारे गुण भी मैं और इन गुणों से परे गुणातीत भी मैं हूँ , यही भाव है । अध्याय 2 मे भगवान ने व्यवसायात्मिका शब्द का उपयोग किया है -  व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41।       हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।   कर्मयोग के साधन से आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चि...

गीता दृष्टि

  द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।   जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।10.36। ।   मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता, निश्चय , संकल्प ) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।   यहाँ दिया हुआ उदाहरण अर्जुन को तत्क्षण ही समझ में आने जैसा है। कारण यह है कि उसका सम्पूर्ण जीवन दुखों की एक शृंखला थी, जिसे उसे सहन करना पड़ा था, केवल अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की द्यूत खेलने के व्यसन के कारण। कोई अन्य दृष्टान्त अर्जुन के लिए इतना सुबोध नहीं हो सकता था,इसलिए भी भगवान ने इस उदाहरण को चुना । जुए की एक खूबी है जुए में कोई कभी जीतता नहीं; यही उसका छल है। और हरेक जीतता हुआ मालूम पड़ता है, यह भी उसका छल है। हरेक जीतने की आकांक्षा से जुए के पासे फेंकता है और हर एक को लगता है कि जीत निश्चित है। लेकिन जुए में कोई कभी जीतता नहीं। और जो जीतते हुए मालूम भी पड़ते हैं, वे केवल और बड़ी हारों की तैयारी कर रहे होते हैं।वह शुद्धतम छल है। कभी कोई जीतता नहीं, अंतत: कोई जीतता नहीं। आखिर में हाथ खाली ...

गीता दृष्टि

  बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।   मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।10.35।।   तथा साम मंत्रों में  मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ; मैं मासों में मार्गशीर्ष (अगहन) और ऋतुओं में वसन्त हूँ।।   मैं सामों में बृहत्साम हूँ  -  भगवान् ने पहले कहा था कि, वेदों में सामवेद मैं हूँ। ‘साम‘ शब्द का अर्थ है ‘गान‘। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था। सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 75 से अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं। इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता‘ करते थे। अब यहाँ सामवेद में भी विशेषता बताते हैं कि मैं सामों में बृहत्साम हूँ। ऋग्वेद की जिन ऋचाओं को सामवेद में गाया जाता है- उन्हें साम कहते हैं। उनमें एक साम वह है,  जिसमें इन्द्र की सर्वेश्वर के रूप में स्तुति की गई है-  जिसे बृहत्साम कहते हैं , जिसका उल्लेख भगवान ने यहाँ किया है। साममन्त्रों का गायन विशिष्ट पद्धति का होने के कारण अत्यन्त कठिन है,  जिन्हें सीखने के लिए वर्षों तक गुरु के पास रहकर साधना करनी पड़त...

गीता दृष्टि

मृत्यु :   सर्वहरश्चाहमुद्रभवश्च   भविष्यताम् । कीर्ति :   श्रीर्वाक्य   नारीणा   क्यृतिर्मेधा   धृति :   क्षमा ।। 34।। मैं सब का नाश करने वाली मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ; स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।। गीता मे नारी का यहीं उल्लेख किया गया है । और यह भी विशेष है की यह स्त्रीयां सात देवताओं की भार्या होने के साथ स्त्रीवाचक नाम गुण के रूप में भी प्रसिद्ध हैं ।  मेधा को धर्म की पत्नी बताया गया है , । धृति का अर्थ है - धारण करने की क्रिया या भाव , धारण करने का गुण या शक्ति , धारणा-शक्ति , चित्त या मन की अविचलता , दृढ़ता या स्थिरता , पकड़ । धृति दक्ष की एक कन्या , जो धर्म की पत्नी थी , अश्वमेध की एक आहुति , सोलह मातृकाओं में से एक , अठारह अक्षरों वाले वृत्तों की संज्ञा , चन्द्रमा की सोलह कलाओं में से एक कला का नाम , फलित ज्योतिष में एक प्रकार का योग। स्त्री सौंदर्य का प्रतीक है तो उसके  आंतरिक गुण उसके भीतर का सौन्दर्य है जिसका उल्लेख इन नामो से हो जाता । यह स्त...