गीता दृष्टि
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।10.36।। मैं तेजस्वियों का तेज हूँ । तेजस्वी वस्तुओं का जो तेज है, उसमें उस वस्तु के गुण नहीं होते हैं। उस तेज में अपने स्वयं के गुण भी नहीं होते। तेज केवल एक अनुभव है। जैसा कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था- निसन्देह सत्य एक प्रकाश है, परन्तु वह गुणरहित प्रकाश है। जीतने वालों की जय निश्चय करने वालों का निश्चय एवं सात्विक लोगो का सत्व मैं हूँ । यह सारे गुण भी मैं और इन गुणों से परे गुणातीत भी मैं हूँ , यही भाव है । अध्याय 2 मे भगवान ने व्यवसायात्मिका शब्द का उपयोग किया है - व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।2.41। हे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं। कर्मयोग के साधन से आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चि...