गीता दृष्टि
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।।10.32।।
हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ, मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या और विवाद करने वालों में (अर्थात् तत्व निर्णय के लिए ) मैं वाद हूँ।।
अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारम्भ करने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का सामान्य कथन ही यहाँ प्रतिध्वनित होता है। वहाँ उन्होंने यह बताया है कि वे किस प्रकार प्रत्येक वस्तु और प्राणी की आत्मा हैं। भगवान आदि और अंत के बाद मध्य भी कह देते है । अध्याय 2 .28 मे भगवान ने कहा है -
हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है? यह बात अर्जुन को एक सामान्य मनुष्य के दृष्टिकोण से काही गई थी इसलिए ही यहाँ भी उन्हें मध्य कहना था । आज का व्यक्त इसके पूर्व कल अव्यक्त था वर्तमान में वह व्यक्त रूप में उपलब्ध है परन्तु भविष्य में फिर अव्यक्त अवस्था में विलीन हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान स्थिति अज्ञात से आयी और पुन अज्ञात में लीन हो जायेगी। ऐसा समझने पर दुख का कोई कारण नहीं रह जाता।
ठीक यही बात अध्याय 2.12 मे भी देखें -
वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था
अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम
सब नहीं रहेंगे।
अध्यात्म—विद्या उसकी विद्या है, जिससे हम स्वयं को जानते हैं। और तब यह भी हो सकता है कि एक अध्यात्म ज्ञानी कुछ भी और न जानता हो।
Of creatures, I am the beginning and the end, and also
the middle, O Arjuna. Of sciences I am the science of self (of the
individual and Universal Self). Of those who argue, I am the fair
reasoning.
English Translation By Swami Adidevananda
ओशो ने कहा है --
ब्रह्म—विद्या, अध्यात्म—विद्या का अर्थ है, वह विद्या, वह सुप्रीम साइंस,
जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो हम हैं। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो सब
जान रहा है। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जिसकी कोई मृत्यु नहीं, जिसका कोई
जन्म नहीं।
श्वेतकेतु लौटा वापस, अध्ययन करके समस्त शास्त्रों का। जो भी जानने योग्य
था, जान आया। निश्चित ही, जानने की अकड़ आ गई। जब वह गांव के भीतर प्रविष्ट
हुआ, उसके पिता ने देखा अपने मकान से, श्वेतकेतु अकड़ा हुआ चला आ रहा है।
पंडित की अकड़! आया, तो पिता ने कहा कि मालूम होता है, तू सब जानकर आ गया!
श्वेतकेतु ने कहा, सब जानकर आ गया जो भी जानने के लिए था। जितनी विद्याएं
थीं, सब सीख आया हूं।उसके पिता ने कहा, बस, एक सवाल तुझसे मुझे पूछना है। तूने उसे भी जाना या
नहीं, जिससे सब जाना जाता है? उसने कहा, यह तो कोई विद्या मैंने सुनी नहीं!
मेरे गुरु ने इसके बाबत कोई बात नहीं की!तो उसके पिता ने कहा, तू वापस लौट जा। तू उसको जानकर लौट, जिसे बिना जाने
सब जानना बेकार है। और जिसे जान लेने से सब जान लिया जाता है। श्वेतकेतु
वापस लौट गया।ब्रह्म—विद्या का अर्थ वह विद्या है, जिससे हम उसे जानते हैं, जो सब जानता
है। गणित आप जिससे जानते हैं, फिजिक्स आप जिससे जानते हैं, केमिस्ट्री आप
जिससे जानते हैं, उस तत्व को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है। जानने वाले को
जान लेना ब्रह्म—विद्या है। शान के स्रोत को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है।
भीतर जहां चेतना का केंद्र है, जहां से मैं जानता हूं आपको, जहां से मैं
देखता हूं आपको; जिससे मैं देखता हूं उसे भी देख लेना, उसे भी जान लेना,
उसे भी पहचान लेना, उसकी प्रत्यभिज्ञा, उसका पुनर्स्मरण ब्रह्म—विद्या है।
कृष्ण कहते हैं, विद्याओं में मैं ब्रह्म—विद्या हूं।
सत्य के निर्णय के लिए जो आतुर हैं, सत्यनिष्ठ, जिन्हें इससे प्रयोजन नहीं
है कि पक्ष में पड़ेगा कि विपक्ष में, मैं हारूंगा कि जीतूंगा; जिन्हें
प्रयोजन इतना है कि सत्य क्या है, उसकी परख हो जाए, उसका पता चल जाए; ऐसे
सत्य के लिए किया गया वाद, ऐसे सत्य की जिज्ञासा के लिए किया गया तर्क मैं
हूं।
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