गीता दृष्टि

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।10.30।।

मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
देवताओं की नाग की यम की चर्चा के बाद भगवान दैत्यों पर आते है ,यहा यह भी उल्लेखनीय है कि गीता मे केवल यहाँ ही इस शब्द का प्रयोग किया गया है । दैत्य वायुपुराण के अनुसार दिति के गर्भ से उत्पन्न कश्यप ऋषि के पुत्र थे।उन्हें 'असुर' और 'राक्षस' भी कहा गया है। देवता दैत्यों के सौतेले भाई थे और कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी अदिति के पुत्र थे।हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष प्रसिद्ध दैत्य थे । प्रह्लाद हिरण्यकश्यप नामक दैत्य राजा का पुत्र था, जिसे भगवान् हरि में अटूट श्रद्धा और दृढ़ भक्ति थी।दैत्य के घर में जन्मता है और परम भक्ति को उपलब्ध हो जाता है।ओशो इसकी व्याख्या कुछ इस तरह से करते हैं -
आदमी का डायनेमिक्स, आदमी के जीवन की गति जो है, वह पोलेरिटीज में होती है, ध्रुवीयता में होती है, वैपरीत्य में होती है। हम सब विपरीत की तरफ झुकते चले जाते हैं।यह प्रहाद की घटना विचारणीय है। इसलिए अपने बच्चों पर अच्छाई जबरदस्ती मत थोपना। नहीं तो बच्चे बुराई की तरफ हट जाएंगे। इसलिए बहुत डेलिकेट है मामला।इसका यह मतलब नहीं है कि आप बुराई थोपना बच्चे पर। बहुत डेलिकेट है, नाजुक है। अच्छाई थोपना मत। और अच्छाई को खिलने में सहयोग देना, थोपना मत। बुराई की इतने जोर से निंदा मत करना कि बुराई में रस पैदा हो जाए। निंदा से रस पैदा होता है। बुराई का इतना निषेध मत करना कि निमंत्रण बन जाए।बुराई को ऑब्सेशन मत बना देना। भलाई को इतना मत थोपना कि उसके विपरीत भाव पैदा हो जाए।यह प्रह्लाद के भीतर जो गति पैदा हुई, यह प्रह्लाद के पिता की वजह से पैदा हुई। और चूंकि वह दैत्यों के घर में पैदा हुआ था, इसलिए जब विपरीत चला, तो ठीक दैत्यों से उलटा सारे भक्तों को पार कर गया।

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