गीता दृष्टि

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।10.30।।

 
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ।।

गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ । काल समय का बोध करता है । काल  मृत्यु का नाम है । काल से भगवान यहाँ गणना करने वालो का बोध कराते हैं ।
समय भी बड़ा कैलकुलेटर है। समय से ज्यादा ठीक गिनती करने वाला कोई भी नहीं दिखाई पड़ता। एक—एक व्यक्ति को एक—एक क्षण से ज्यादा कभी नहीं मिलता, काल ध्रुव का भी नाम है जो राजा उत्तानपाद के सुनीति से उत्पन्न हुये । यह कहानी सभी को ज्ञात है - ध्रुव ने नारद जी के कहने पर नारायण की भक्ति की और उसकी तपस्या से भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन देकर कहा-

" हे राजकुमार! मैं तेरे अन्तःकरण की बात को जानता हूँ । तेरी सभी इच्छायें पूर्ण होंगी । तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुझे वह लोक प्रदान करता हूँ जिसके चारों ओर ज्योतिश्चक्र घूमता रहता है तथा जिसके आधार पर यह सारे ग्रह नक्षत्र घूमते हैं । प्रलयकाल में भी जिसका नाश नहीं होता । सप्तर्षि भी नक्षत्रों के साथ जिसकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं । ध्रुव सत्य कहा जाता और सत्य ही ईश्वर है । व्यष्टि मन और बुद्धि ही काल के विभाजक हैं,  जो उसमें भूत,  वर्तमान और भविष्य की कल्पनायें करते हैं।

संस्कृत मे चौपाये को मृग कहते है और उन चौपायो मे मैं सिंह हूँ ।
पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ



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