गीता दृष्टि

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।।10.31।।
 

मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ; तथा मत्स्यों (जलचरों) में मैं मगरमच्छ और नदियों में मैं गंगा हूँ।


किसी स्थान की स्वच्छता के लिए सूर्य और वायु के समान प्रभावशाली अन्य कोई स्वास्थयकर साधऩ उपलब्ध नहीं है। यदि यहाँ केवल वायु का ही उल्लेख किया गया है,  तो उसका कारण यह है कि  सूर्य की उष्णता में ही वायु की गति हो सकती है। जहाँ सदा वायु बहती है,  वहाँ सूर्य का होना भी सिद्ध होता है। किसी गुफा में न सूर्य का प्रकाश होता है और न वायु का स्पन्दन।वायु इस जगत में सर्वाधिक स्वतंत्र है। और स्वतंत्रता ही पवित्रता है। वायु कहीं बंधी नहीं है, कहीं ठहरी नहीं है, कहीं उसका लगाव नहीं है, कहीं उसकी आसक्ति नहीं है। वायु एक सतत गति है।जहां ठहराव है वहाँ अपवित्रता होगी ही -- जैसे नदी बहती है, तो नदी पवित्र होती है। और डबरा बहता नहीं, अपवित्र हो जाता है।ठहराव का अर्थ यूं समझें जैसे आसक्ति । प्राचीन समय से संन्यासी को प्रवाहवत जीवन व्यतीत करने को कहा गया है। नदी की तरह बहता रहे । वायु कहीं भी मेहमान नहीं बनती; स्पर्श करती है और हट जाती है। कृष्‍ण कहते हैं, पवित्र करने वालों में मैं वायु हूं।वायु कहीं रुकती नहीं है दूसरे वायु दृश्य नहीं होती , दिखाई नहीं देती ,लेकिन अनुभव मे आती है । एक बहुत पुरानी इजिप्त में लोकोक्ति है कि जब कोई व्यक्ति परम पवित्र हो जाता है, तो उसकी छाया नहीं बनती। जब वह चलता है धूप में, तो उसकी छाया नहीं बनती।यह सिर्फ इसी बात के लिए इशारा है कि जिसके भीतर कोई अशुद्धि न रह गई हो, तो उसके आर—पार दिखाई पड़ने लगता है। और जिसके आर—पार दिखाई पड़ने लगे, उसकी छाया नहीं बनेगी। छाया नहीं बनेगी, यह केवल प्रतीक है।

मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ- राम मर्यादा पुरुषोत्तम है , श्रीराम एक पूर्ण एवं आदर्श पुत्र,  पति, भ्राता, मित्र,योद्धा,गुरु, शासक और पिता थे। सामान्य जनता के दोषों तथा अत्यन्त उत्तेजना और भ्रम उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में श्रीराम की  पूर्णता,समता और भी अधिक चमक उठती है। ऐसे सर्वश्रेष्ठ आदर्श पुरुष के हाथ में ही शस्त्र धारण योग्यता है - इसलिए भगवान ने अन्य शस्त्रधारियों मे राम को चुना । ओशो का कथन है -

बुराई में भी सब बुराई नहीं है, और भलाई में भी सब भलाई नहीं है। बुराई में भी ताकत तो भली है, और भलाई में भी ताकत की कमी बुरी है। भले को भी शक्तिशाली होना चाहिए। इस जगत में बुराई कम होगी तभी, जब भला भी शक्तिशाली हो। तभी होगी कम, जब भला भी शक्ति को निर्मित करे। भला शक्ति से भाग जाए, तो वह बुरे आदमी को बुरा होने की सुविधा दे रहा है, मार्ग दे रहा है। वह साथी और संगी बन रहा है— बिना जाने, बिना इच्छा के।रावण की असली पराजय यही है कि रावण राम को अपने जैसा नहीं बना पाया। असली पराजय यही है। राम राम ही बने रहे। उनके व्यक्तित्व में जरा—सी एक कली भी नहीं सूखी। उनका फूल फूल जैसा ही खिला रहा। उनकी तलवार, उनके हाथ के शस्त्र, उनके भीतर की मनुष्यता में जरा—सा भी फर्क न ला पाए। वही रावण की हार है, वहीं रावण पराजित हो गया है--
इसलिए , कृष्‍ण कहते हैं कि-- मैं शस्त्रधारियों में राम हूं।
मैं शस्त्र भी ले सकता हूं लेकिन उससे मैं नहीं बदलता। शस्त्र मुझे नहीं बदल सकता है, यह उनका प्रयोजन है। मैं कुछ भी करूं, मेरा करना मेरी आत्मा को नहीं बदल सकता है, यह उनका अभिप्राय है।
मैं मत्स्यों में मकर तथा नदियों में जाह्नवी हूँ ।समुद्री मत्स्यों में मकर सर्वाधिक भयंकर होने के कारण यहाँ भगवान् ने उसे अपनी विभूति कहा है। जह्नु ऋषि की पुत्री जाह्नवी कहलाती है  जो गंगानदी का एक नाम हैं। आख्यायिका यह है कि एक बार जह्नु ऋषि ने सम्पूर्ण गंगा नदी का पान कर उसे सुखा दिया और तत्पश्चात् लोककल्याण के लिए उसे अपने कानों के द्वार से बाहर बहा दियाआख्यायिका में कहा गया है कि इस नदी का उद्गम ऋषि के कानों से हुआ। वास्तव में, यह अत्यन्त सुन्दर काव्यात्मक कल्पना है जो कान का संबंध श्रुति से स्थापित करती है। उपनिषद् ही श्रुति हैं । गंगा की यह विशेषता की उसका पानी सडता नहीं, ।ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार गंगा को विष्णु के पाँव से एवं शिव के जटाजूट में अवस्थित माना गया है।


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