गीता दृष्टि

      अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। 

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।।10.42।।

 अथवा  , हे अर्जुन ! बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।

ईश्वर के अनंत होने का अर्थ है, यह जगत उसकी एक अभिव्यक्ति है। उसकी अनेक अभिव्यक्तियां हो सकती हैं। होती रही हैं। होती रहेंगी। इसलिए कहा, एक अंश में ही मेरी योग—माया का उपयोग है।अनन्त तत्त्व के अनन्त विस्तार का वर्णन कैसे संभव हो सकता है असमर्थता के कारण उन्हें विषाद है किन्तु पुन अपने शिष्य के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण? भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण अध्याय का सार इस अन्तिम श्लोक में बताते हैं।इस बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है वास्तव मे देखा जाय- तो अनन्त तत्त्व को प्रत्येक परिच्छिन्न रूप में दर्शाने का प्रयत्न व्यर्थ ही है? क्योंकि वह असंभव है। योग—माया शब्द का ठीक वही अर्थ होता है, जो अंग्रेजी में मैजिक का होता है, जादू का होता है। लेकिन जादू तो जादूगर करता है! पर आपने खयाल किया, जादूगर करता क्या है? वह कहता है कि यह रहा, यह आम और आम हो जाता है । आम तो होता नहीं है लेकिन वह आपको दिखाई पड़ता है
मैजिक का अर्थ है, जो नहीं है, वह आपको दिखाई पड़े।ईश्वर की भारतीय जो धारणा है, वह यह है कि जगत भी है नहीं, केवल ईश्वर चाहता है, इसलिए दिखाई पड़ता है। यह है नहीं, केवल ईश्वर चाहता है, इसलिए दिखाई पड़ता है। इसका होना केवल उसकी धारणा है, उसका विचार है।
बहुत बड़े वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है कि जब मैं नया—नया विज्ञान के जगत में प्रविष्ट हुआ था, तो मैं सोचता था कि जगत एक वस्तु की भांति है, जस्ट लाइक ए थिंग। अंतिम जीवन के दिनों में एडिंगटन ने कहा है, जब वह नोबल प्राइज पा चुका था और जगत विख्यात हो गया था, तो उसने कहा है कि अब जितना ही मैंने अनुभव किया है, दि यूनिवर्स लुक्स मोर लाइक ए थाट, दैन लाइक ए थिंग—एक विचार की भांति मालूम पड़ता है यह जगत, एक वस्तु की भांति नहीं।
लेकिन किसका विचार?
एडिंगटन वैज्ञानिक आदमी है, वह यह नहीं कह सकता, ईश्वर का विचार। क्योंकि ईश्वर का उसे कोई पता नहीं है।
कृष्‍ण कहते हैं, यह सारा जगत मेरी योग—माया के एक अंश का विस्तार है, मेरे विचार का, मेरे खयाल का।
यह सारा अस्तित्व एक स्वप्न है गहन, उस मूल ऊर्जा का एक स्वप्न। उस मूल ऊर्जा का एक भाव, और जगत निर्मित हो जाता है। उस मूल ऊर्जा का भाव क्षीण होता है, और जगत खो जाता है।
अगर हम भौतिकवादी और गैर— भौतिकवादी विचारों में भेद करना चाहें, तो वह यही होगा कि भौतिकवादी, मैटीरियलिस्ट कहता है कि जगत की जो बुनियादी इकाई है, वह पदार्थ है; और अध्यात्मवादी कहता है, जगत की जो मौलिक इकाई है, वह विचार है। जगत जिन ईंटों से बना है, वे इटइं विचार की हैं। और अगर पदार्थ भी हमें दिखाई पड़ता है, तो वह विचार की सघनता है, डेंसिटी आफ थाट। और जिसे हम अपने भीतर विचार कहते हैं, उसमें और बाहर पड़े हुए पत्थर में जो फर्क है, वह गुण का नहीं है, मात्रा का है, डिग्रीज का है। अगर विचार ही गहन सघन हो जाए, तो पत्थर भी मौजूद हो सकता है, मैटीरिअलाइज हो सकता है।
कृष्‍ण कहते हैं, यह मेरी योग—माया का एक अंश है और इस अंश पर ही मैं सारे जगत को धारण करके ठहरा हुआ हूं इसलिए मेरे को ही तत्व से जान। तू और विस्तार में मत पड़। तू सीधा मुझको ही तत्व से जान। मैं ही आधारभूत हूं या जो आधारभूत है, वही मैं हूं।
  Thus, all this and the prime cause of creatures, are nothing but the Bhagavat (Absolute). And hence, He Himself becomes the object of knowledge of all, but being comprehended with the different strange alities.

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