गीता दृष्टि

मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्रभवश्च भविष्यताम्
कीर्ति: श्रीर्वाक्य नारीणा क्यृतिर्मेधा धृति: क्षमा।। 34।।
मैं सब का नाश करने वाली मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ; स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।।
गीता मे नारी का यहीं उल्लेख किया गया है । और यह भी विशेष है की यह स्त्रीयां सात देवताओं की भार्या होने के
साथ स्त्रीवाचक नाम गुण के रूप में भी प्रसिद्ध हैं ।  मेधा को धर्म की पत्नी बताया गया है , । धृति का अर्थ है -धारण करने की क्रिया या भाव, धारण करने का गुण या शक्ति, धारणा-शक्ति, चित्त या मन की अविचलता, दृढ़ता या स्थिरता, पकड़ । धृति दक्ष की एक कन्या, जो धर्म की पत्नी थी, अश्वमेध की एक आहुति, सोलह मातृकाओं में से एक, अठारह अक्षरों वाले वृत्तों की संज्ञा, चन्द्रमा की सोलह कलाओं में से एक कला का नाम, फलित ज्योतिष में एक प्रकार का योग।
स्त्री सौंदर्य का प्रतीक है तो उसके  आंतरिक गुण उसके भीतर का सौन्दर्य है जिसका उल्लेख इन नामो से हो जाता । यह स्त्रेण गुण पुरुष के भी   आंतरिक गुण है । अर्थात हर पुरुष के अंदर नारी है ।  अर्धनारीश्वर का स्वरूप इसी कारण है ।  स्त्रियों में भी अगर परमात्मा खोजना हो, तो कहां खोजा जा सकेगा? अगर स्त्रियों में भी परमात्मा की झलक पानी हो, तो वह कहां पाई जा सकेगी? स्त्री के वासना से इतर स्वरूप मे जो पहला संबंध बनता है वह माँ का होता है ,जो जन्म देती है - वहाँ फिर स्त्री मे ईश्वर का तत्व शामिल हो जाता है । कीर्ति एक आंतरिक गुण है, एक भीतरी सौंदर्य है। उस सौंदर्य का नाम कीर्ति है, जिसे देखकर वासना शांत हो, उभरे नहीं।  कीर्ति का अर्थ हुआ कि जिस स्त्री के पास बैठकर आपकी वासना तिरोहित हो जाए। इसलिए हमने मां को इतना मूल्य दिया। कीर्ति के कारण मां को हमने इतना मूल्य दिया, मातृत्व को इतना मूल्य दिया।पुराने ऋषियों ने आशीर्वाद दिए हैं, बड़े अजीब आशीर्वाद! नववधू को आशीर्वाद दिया है, आशीर्वाद दिए हैं, कि दस तेरे पुत्र हों और अंत में तेरा पति तेरा ग्यारहवां पुत्र हो जाए। और जब तक पति भी तेरा पुत्र न हो जाए, तब तक तू जानना कि तूने स्त्री की परम गरिमा उपलब्ध नहीं की।
श्री का अर्थ सोन्दर्य भी है ,  चमक भी है , लक्ष्मी भी है । लक्ष्मी जी की अभिव्यक्ति दो रूपों में देखी जाती है-
  1. श्रीरूप
  2. लक्ष्मी रूप                                                                    यह दो होकर  भी एक हैं और एक होकर भी दो हैं। दोनों ही रूपों में ये भगवान विष्णु की पत्नी हैं। इनकी थोड़ी-सी कृपा प्राप्त करके व्यक्ति वैभववान हो जाता है। भगवती लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं। समस्त सम्पत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्त्वमयी हैं। विकार और दोषों का वहाँ प्रवेश भी नहीं  -        कृष्‍ण कहते हैं, मैं वाक् हूं स्मृति हूं मेधा हूं धृति हूं क्षमा हूं।स्त्रियों के गुण अलग हैं।
    इसलिए कृष्‍ण ने उचित ही किया कि स्त्रियों के गुण अलग से गिनाए और कहा कि अगर मुझे तुझे स्त्रियों में खोजना हो तो तू कीर्ति में, श्री में, वाक् में, स्मृति में, मेधा में, धृति में और क्षमा में मुझे देख लेना।

 

 

 

 

 


Comments

Popular posts from this blog

गीता दृष्टि

गीता दृष्टि

गीता दृष्टि