गीता दृष्टि

 द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। 

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।10.36।

  मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता, निश्चय ,

संकल्प ) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।

  यहाँ दिया हुआ उदाहरण अर्जुन को तत्क्षण ही समझ में आने जैसा है। कारण यह है कि उसका सम्पूर्ण जीवन दुखों की एक शृंखला थी, जिसे उसे सहन करना पड़ा था, केवल अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की द्यूत खेलने के व्यसन के कारण। कोई अन्य दृष्टान्त अर्जुन के लिए इतना सुबोध नहीं हो सकता था,इसलिए भी भगवान ने इस उदाहरण को चुना ।
जुए की एक खूबी है जुए में कोई कभी जीतता नहीं; यही उसका छल है। और हरेक जीतता हुआ मालूम पड़ता है, यह भी उसका छल है। हरेक जीतने की आकांक्षा से जुए के पासे फेंकता है और हर एक को लगता है कि जीत निश्चित है। लेकिन जुए में कोई कभी जीतता नहीं। और जो जीतते हुए मालूम भी पड़ते हैं, वे केवल और बड़ी हारों की तैयारी कर रहे होते हैं।वह शुद्धतम छल है। कभी कोई जीतता नहीं, अंतत: कोई जीतता नहीं। आखिर में हाथ खाली रह जाते हैं। खेल बहुत चलता है लेकिन, हार—जीत बहुत होती है।इसे जीवन का प्रतीक समझे क्यूंकी यह भी एक छल ही है । महाभारत में कथा है ययाति की। ययाति सौ वर्ष का हुआ मौत उसके द्वार पर आई, तो ययाति ने कहा कि एक क्षण रुक। अभी तो मेरा कुछ भी काम पूरा नहीं हुआ। अभी तो मैं वहीं खड़ा हूं जहां जन्म के दिन खड़ा था।मृत्यु ने मजाक में ही ययाति से कहा, अगर तेरा कोई पुत्र तुझे अपना जीवन दे दे, तो मैं उसे ले जाऊं और तुझे छोड़ जाऊं! ययाति ने अपने सौ पुत्रों को कहा कितुम अपना जीवन तुम मुझे दे दो, मेरा जीवन अधूरा रह गया है।लेकिन बेटों की अपनी वासनाएं थीं, जो और भी अधूरी थीं। बेटों को तो और भी समय चाहिए था। लेकिन एक छोटा बेटा राजी हो गया। ययाति ने उससे पूछा भी कि तू क्यों राजी हो रहा है? उसने कहा कि मैं इसलिए राजी हो रहा हूं कि अगर सौ वर्ष जीकर भी आपकी वासना तृप्त नहीं हुई, तो मैं भी इस मेहनत में नहीं पडूगा। सौ वर्ष बाद मरना ही है, तो मेरी जिंदगी बेकार चली जाएगी, अभी कम से कम इतने तो काम आ रही है कि आप कुछ दिन और जी लेंगे।फिर भी ययाति को नसमझ मे आया । बेटा मर गया, ययाति और सौ साल जीया। ये सौ साल कब निकल गए, पता न चला । ऐसा दस बार हुआ और ययाति हजार साल जीया। और हजार साल बाद जब मौत आई, तब भी ययाति ने वही कहा कि इतनी जल्दी! अभी मुझे समय चाहिए।हमारी भी यह कोई पहली जिंदगी नहीं है। हर जिंदगी में हमने यही किया है। फिर समय मांगा है, हमें फिर जन्म मिल गया है। हर बार वासना अधूरी रही है। हम पुनर्जन्म पा गए हैं।कृष्ण कहते है -   मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ

 

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